Pubg Game औऱ अपाहिज होती इंसानी नस्ल
गेम में हारने पर एक युवक ने की खुदकुशी, गेम खेलते खेलते बच्चे ने छोड़ी परीक्षा, और ना जाने क्या क्या. ऐसी बहुत सारी खबरें आपने किसी न्यूज़ चैनल पर देखी या सुनी होंगी. पर एक आम सी ख़बर समझ कर आपने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया होगा. पर क्या हक़ीक़त में इसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है. ये ख़बरें इस सच्चाई को बयां करती हैं कि किस तरह से हम टेक्नोलॉजी के इस युग में बहते और खुद को खोते जा रहे हैं. आज एक बच्चे को उसकी परीक्षा से ज्यादा ज़रूरी Pubg Game में ‘चिकन डिनर’ करना लगता है.
ये Pubg Game पहले दक्षिण कोरिया में बना और फिर ये पूरी दुनिया पर पिछले 3 सालों में ऐसे छाया जैसे इससे पहले कोई दुनिया थी ही नहीं. आज भारत में लगभग 82% लोग मोबाइल गेम्स खेलते हैं, और उनमे आधे से ज्यादा पबजी के जाल में उलझे हुए हैं. आज की पूरी पीढ़ी एक तरह से ये डिजिटल मकड़जाल में उलझ सी गयी है.
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आज-कल खेल के मैदानों में बच्चे दिखते तो हैं मगर मोबाइल में आँखे गड़ाए. अब भी आपको ऐसा नहीं लगेगा कि इसमें इतना परेशान होने वाली बात है. मगर ज़रा सोचिये एक गरीब का मजदूर का बेटा जिसने बोर्ड एग्जाम टॉप किया हो, और उससे माँ-बाप को बहुत सारे सपने हों, पर वो अपने इंजीनियरिंग के आखिरी सेमेस्टर के लगभग हर विषयों में फेल हो गया हो. और इसका कारण कोई और नहीं बस ये है, कि माँ-बाप ने लड़के को 8 हज़ार का फ़ोन खरीद कर दिया कि उसकी पढाई में मदद होगी, पर बेटा उसमे Pubg Game खेलने लग जाता है. और ऐसा खेलता है कि उसकी पूरी ज़िन्दगी बस खेल तक ही सीमित रह जाती है. ये कहानी नहीं है, बल्कि किसी के घटित एक सच है.
सोचिये कि हमारी युवा पीढ़ी यानी हमारे देश की रीढ़ की हड्डी ही, मोबाइल में घुस कर खुद को मरोड़ कर रख चुकी है. इस तरह की पीढ़ी से आप क्या अपेक्षाएं कर सकते हैं? इस तरह के लोग जो गेम्स के चक्कर में अपनी परीक्षाएं छोड़ रहे हैं, वो देश या अपने परिवार को ज़रूरत पड़ने पर क्या दे सकेंगे?


